बेअसर हुईं 60–80% एंटीबायोटिक दवाएं, मामूली चोट भी पहुंचा सकती है हॉस्पिटल; डॉक्टरों की बड़ी चेतावनी

जयपुर। एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आई है। राजस्थान के एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर की जांच में खुलासा हुआ है कि बैक्टीरियल इंफेक्शन में इस्तेमाल होने वाली 60 से 80 प्रतिशत एंटीबायोटिक दवाएं अब असर नहीं कर रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में मामूली चोट या सामान्य संक्रमण भी मरीज को अस्पताल तक पहुंचा सकता है


एक केस जिसने सबको चौंकाया

डायबिटीज से पीड़ित एक मरीज का एक्सीडेंट हुआ और पैर में चोट लगी। डॉक्टर ने एंटीबायोटिक दी, लेकिन दवा बेअसर रही। इंफेक्शन फैलता गया और मरीज को आखिरकार हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा। हालत इतनी बिगड़ी कि मरीज सेप्टीसीमिया में चला गया। जांच में सामने आया कि मरीज पर बहुत कम एंटीबायोटिक दवाएं ही काम कर पा रही थीं।

डॉक्टरों के मुताबिक, यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि बढ़ते एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की गंभीर तस्वीर है।


पीएम मोदी ने भी जताई चिंता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी। उन्होंने लोगों से अपील की थी कि बिना डॉक्टर की सलाह और बिना जरूरत एंटीबायोटिक न लें
पीएम मोदी ने बताया था कि निमोनिया और यूरिन इंफेक्शन जैसी बीमारियों में भी एंटीबायोटिक का असर कम हो रहा है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।


60–80% तक दवाओं पर रेजिस्टेंस

एसएमएस मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रमुख एंटीबायोटिक दवाओं पर गंभीर स्तर का रेजिस्टेंस सामने आया है—

  • Ampicillin: 85%

  • Ceftazidime: 70–80%

  • Ciprofloxacin: 70–80%

  • Piperacillin–Tazobactam: 60–70%

  • Meropenem: 50–60%

डॉक्टरों ने बताया कि Acinetobacter, Pseudomonas और Klebsiella जैसे बैक्टीरिया मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट हो चुके हैं, जिससे इलाज और कठिन होता जा रहा है।


WHO ने तीन ग्रुप में बांटी हैं एंटीबायोटिक दवाएं

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीबायोटिक को तीन श्रेणियों में बांटा है—

1. एक्सेस ग्रुप:
जिनका सामान्य संक्रमण में उपयोग होता है, लेकिन इनमें से कई अब असर खो रही हैं।

2. वॉच ग्रुप:
जिनका इस्तेमाल सीमित और सावधानी से किया जाना चाहिए।

3. रिजर्व ग्रुप:
अंतिम विकल्प, जब बाकी सभी दवाएं बेअसर हो जाएं।

डॉक्टरों के मुताबिक, अब कई मामलों में रिजर्व ग्रुप की दवाओं तक पहुंचना पड़ रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।


रेजिस्टेंस बढ़ने के प्रमुख कारण

एसएमएस मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. रजनी शर्मा के अनुसार—

  • बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक लेना

  • सर्दी, खांसी और बुखार में भी एंटीबायोटिक का इस्तेमाल

  • पशुओं के चारे में एंटीबायोटिक का उपयोग

  • फार्मा इंडस्ट्री का वेस्ट वॉटर में दवाओं का अवशेष छोड़ना

  • अस्पतालों में जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक का प्रयोग

इन सभी कारणों से बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बनते जा रहे हैं।


रेगुलेशन और जागरूकता जरूरी

टोंक मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. लोकेन्द्र शर्मा ने कहा कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस अब ग्लोबल थ्रेट बन चुका है और इसे रोकने के लिए सख्त नियम और जनजागरूकता जरूरी है।

वहीं, एसएमएस मेडिकल कॉलेज के सीनियर प्रोफेसर डॉ. पुनीत सक्सेना ने ‘राइट पॉलिसी’ अपनाने पर जोर दिया—

  • राइट पेशेंट

  • राइट एंटीबायोटिक

  • राइट डोज

  • राइट समय

  • राइट समय पर दवा बंद करना


निष्कर्ष:

एंटीबायोटिक दवाओं का लापरवाह और गैर-जरूरी इस्तेमाल धीरे-धीरे इन्हें बेकार बना रहा है। अगर समय रहते जागरूकता और सख्त नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकता है। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेना अब सिर्फ गलती नहीं, बल्कि खतरनाक आदत बन चुकी है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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